कंथापुरम ए. पी. अबूबकर मुसलियार, जिन्हें आधिकारिक तौर पर शेख अबूबकर अहमद कहा जाता है, भारत के सुन्नी-शाफई परंपरा के सबसे प्रभावशाली इस्लामी विद्वानों में से एक हैं। केरल के कोझिकोड जिले के कंथापुरम गांव से उठकर वे शिक्षा, अनाथ बच्चों की देखभाल, सांप्रदायिक सद्भाव और धार्मिक कूटनीति के क्षेत्र में एक राष्ट्रीय चेहरा बन गए। 24 फरवरी 2019 को दिल्ली के रामलीला मैदान में ऑल इंडिया तंजीम उलेमा-ए-इस्लाम द्वारा उन्हें “ग्रैंड मुफ्ती ऑफ इंडिया” की उपाधि दी गई। यह पद भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त सरकारी पद नहीं है, बल्कि समुदाय का सम्मानजनक खिताब है। वे ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल उलेमा और समस्त केरल जमीयतुल उलेमा (एपी गुट) के महासचिव भी हैं।
उनका जन्म 22 मार्च 1931 को तत्कालीन मलाबार जिले के कंथापुरम में हुआ। पिता मौतारीयिल अहमद हाजी और माता कुंचीमा हज्जुम्मा थीं। प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय मदरसे और स्कूलों में हुई। इसके बाद उन्होंने वावद, चालियम, तलाक्कदात्तूर जैसे दर्सों में पारंपरिक इस्लामी शिक्षा ली और 1963 के आसपास वेल्लोर की जामिया बाकियातुस्सालिहात से मौलवी फाजिल की डिग्री प्राप्त की। अरबी, मलयालम, उर्दू, तमिल और अंग्रेजी पर उनकी पकड़ है।
1980 के दशक के अंत में समस्त केरल जमीयतुल उलेमा में विभाजन हुआ। वे एपी गुट के प्रमुख नेता बने। तब से उनके संगठन की पहचान शिक्षा और कल्याण कार्यों से जुड़ी रही। 2022 में उन्हें स्ट्रोक हुआ था, इसके बाद भी वे सार्वजनिक भूमिका में सक्रिय रहे।
उनका सबसे ठोस योगदान शिक्षा है। 1978 में उन्होंने कोझिकोड के करन्तूर में मरकज़स्सकाफतिस्सुन्निय्या (जामिया मरकज़) की स्थापना की। यह संस्थान धार्मिक शिक्षा को आधुनिक विषयों, विज्ञान, कला, कानून, यूनानी चिकित्सा, आईटीआई, से जोड़ता है। मरकज़ नॉलेज सिटी (कैतप्पोयिल, लगभग 125 एकड़) इसी सोच का विस्तार है: मस्जिद, कॉलेज, स्कूल, अस्पताल और सांस्कृतिक केंद्र एक साथ।
वे सांप्रदायिक सद्भाव पर जोर देते हैं। नॉलेज सिटी में सभी धर्मों के गरीबों के लिए इफ्तार का आयोजन होता रहा है। संस्थान में गैर-मुस्लिम छात्र और शिक्षक भी हैं। पड़ोस के घरों को पेयजल उपलब्ध कराने जैसे स्थानीय काम भी किए जाते हैं। कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के आग्रह पर उन्होंने कश्मीरी छात्रों को मरकज़ में जगह दी; रिपोर्टों के अनुसार वहां सैकड़ों कश्मीरी छात्र पढ़ चुके हैं।
27 अगस्त 2014 को उन्होंने आईएसआईएस के खिलाफ फतवा जारी किया। कई रिपोर्टों में इसे भारतीय सुन्नी विद्वानों की ओर से पहला ऐसा फतवा बताया गया। शांति सम्मेलन, दुबई के टॉलरेंस समिट और मानव बंधुत्व जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करते रहे। “द 500 मोस्ट इन्फ्लुएंशियल मुस्लिम्स” सूची में भी उनका नाम रहा है। मलेशिया का तोकोह माल हिजरा पुरस्कार और इस्लामिक हेरिटेज अवॉर्ड समेत कई सम्मान मिले हैं।
2026 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर अल्पसंख्यक कल्याण, शिक्षा योजनाओं और क्षेत्रीय विकास की बात की। वे कहते रहे हैं कि विकास सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, मानव विकास और सबके साथ न्याय भी होना चाहिए।
वे अरबी और मलयालम में अधिक लिखते हैं। प्रमुख रचनाएं:
आत्मकथा
विश्वासपूर्वम् (വിശ്വാസപൂർവം), 2024 में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने विमोचन किया, पहली प्रति सांसद शशि थरूर को दी गई। यह व्यक्तिगत जीवन के साथ मलाबार के सामाजिक-धार्मिक इतिहास का दस्तावेज भी माना गया।
अन्य पुस्तकें
- मुहम्मद रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (मलयालम, पैगंबर की जीवनी)
- अरबी: इस्मतुल अंबिया, अस्सियासतुल इस्लामिया, अल वहदतुल इस्लामिया, रियादु तालिबीन आदि
- अंग्रेजी/अन्य: Thoughts of the Muslim World, An Introduction to the Study of Islam, The Hajj, The American Diary, The Holy Prophets
उनके जीवन पर सलाम कोलिक्कल की अंग्रेजी पुस्तक One Time One Life भी आई, जिसमें शशि थरूर की भूमिका है।
केरल की नर्स निमिषा प्रिया यमन में अपने बिजनेस पार्टनर तलाल अब्दो महदी की मौत के मामले में मौत की सजा का सामना कर रही थीं। सजा 16 जुलाई 2025 को लागू होनी थी। सरकारी कूटनीति की सीमाएं थीं क्योंकि सना हुथी नियंत्रण में है।
मुसलियार ने कहा कि उन्होंने “इंसानियत” के नाते हस्तक्षेप किया। उन्होंने यमन के प्रभावशाली सूफी विद्वान शेख हबीब उमर बिन हाफिज से संपर्क किया। इस्लामी कानून में कत्ल के मामले में पीड़ित परिवार को माफ करने या “दियत” (रक्त धन) लेने का अधिकार होता है। परिवार तक पहुंच पहले नहीं बन पा रही थी। धार्मिक माध्यम से बातचीत शुरू हुई, फांसी स्थगित हुई। बाद में उनके कार्यालय ने कहा कि सना की उच्च स्तरीय बैठक में मौत की सजा रद्द कर दी गई; आगे की सजा, आजीवन कारावास या दियत पर रिहाई, परिवार और यमनी प्रक्रिया पर निर्भर है। उन्होंने कहा कि पीएमओ और विदेश मंत्रालय को जानकारी दी जाती रही और वे सरकार के रास्ते को आसान करना चाहते थे, समानांतर कूटनीति नहीं।
यह मामला अधूरा भी माना जा सकता है: निमिषा की पूर्ण रिहाई और स्वदेश वापसी अभी कानूनी-पारिवारिक समझौते पर टिकी है। फिर भी धार्मिक नेटवर्क से एक नागरिक की जान बचाने की कोशिश भारतीय चर्चा में ऐतिहासिक मानी गई।
उनका काम मुख्यतः मरकज़ ट्रस्ट/सोसाइटी के जरिए चलता है, जो 1978 से पंजीकृत गैर-लाभकारी शैक्षिक-धर्मार्थ संगठन है। अलग-अलग नामों वाली दर्जनों छोटी एनजीओ की बजाय एक बड़ा संस्थागत ढांचा है।
राहत के रूप:
- अनाथालयों में मुफ्त भोजन, रहने और पढ़ाई की व्यवस्था, मरकज़ रायहान वैली (लड़के) और ग्रीन वैली (लड़कियां)
- बाढ़, भूस्खलन और कोविड के समय खाद्य राहत; एक खाते के अनुसार कोविड काल में प्रतिदिन एक लाख से अधिक लोगों तक भोजन पहुंचाने का दावा
- भारत में बोरवेल/पेयजल परियोजनाएं
- यूएई के दानकर्ताओं और एमिरेट्स रेड क्रिसेंट जैसे संगठनों का सहयोग
- केरल की बारिश-आपदाओं में सामूहिक सहायता का आह्वान
कुल चैरिटी का एक निश्चित आंकड़ा (जैसे “इतने करोड़ प्रति वर्ष”) सार्वजनिक लेखा में साफ उपलब्ध नहीं है। उनका मॉडल दानराशि एकमुश्त बांटने से ज्यादा स्थायी संस्थान चलाना है, मुफ्त शिक्षा, आवास और आपदा राहत। खाड़ी देशों से आने वाला दान इसका बड़ा स्रोत रहा है।
स्कूल, कॉलेज और मदरसे कितने चल रहे हैं
यहां दो स्तर अलग हैं।
1. मरकज़ के अपने संस्थान (सीधे उनके फ्लैगशिप नेटवर्क):
- जामिया मरकज़ इस्लामिक यूनिवर्सिटी / करन्तूर परिसर
- मरकज़ नॉलेज सिटी के अंतर्गत: यूनानी मेडिकल कॉलेज व अस्पताल (केरल का पहला यूनानी कॉलेज; हाल में एडेड दर्जा मिला), लॉ कॉलेज (कालिकट विश्वविद्यालय व बार काउंसिल से संबद्ध), आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज, आईटीआई, प्रबंधन संस्थान, स्कूल (अलीफ ग्लोबल स्कूल आदि)
- सहायता प्राप्त स्कूल: मरकज़ बॉयज/गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल करन्तूर तथा अन्य
- कुरान अकादमी, शोध केंद्र (WIRAS आदि)
- अनाथालय परिसर
मरकज़ के आंकड़ों और रिपोर्टों में सीधे लाभान्वित छात्रों की संख्या हजारों से लेकर बीस हजार के आसपास बताई जाती है; हजारों छात्रों को मुफ्त शिक्षा-भोजन मिलता है। निजी विश्वविद्यालय की योजना भी उनके संगठन ने घोषित की है।
2. एपी समस्त का मदरसा बोर्ड (SKSVB): समस्त केरल सुन्नी विद्याभ्यास बोर्ड उनके गुट का धार्मिक शिक्षा तंत्र है। बोर्ड की वेबसाइट पर “लगभग दस हजार मदरसे” और बड़ी संख्या में छात्र-शिक्षक होने का दावा है। स्वतंत्र विश्लेषणों में मुख्यधारा का SKIMVB बड़ा माना जाता है, जबकि SKSVB मलाबार (उत्तर केरल) में मजबूत लेकिन तुलना में छोटा है। यानी “उनके मदरसे” का मतलब अक्सर पूरे एपी गुट से संबद्ध मस्जिद-मदरसा नेटवर्क होता है, न कि मरकज़ के अकेले परिसर। सटीक सार्वजनिक गणना साल-दर-साल बदलती रहती है।












