सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू (Markandey Katju) ने एक ट्वीट में भारतीय इस्लाम को सूफी परंपरा से जोड़ते हुए वहाबी और सलाफी विचारधारा पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधता वाले देश में कट्टरता और असहिष्णुता के बजाय प्रेम, भाईचारे और सहनशीलता की जरूरत है।
भारत में मुस्लिम समुदाय के बीच सुन्नी और सूफी परंपरा का लंबे समय से व्यापक प्रभाव रहा है। भारतीय उपमहाद्वीप में सूफी संतों की परंपरा ने प्रेम, मानवता, भाईचारे और धार्मिक सहिष्णुता के संदेश को बढ़ावा दिया। समय के साथ मुस्लिम समाज में अलग-अलग विचारधाराएं और धार्मिक धाराएं भी सामने आईं, जिनमें अहले हदीस, वहाबी और अन्य विचारधाराएं शामिल हैं।
काटजू ने अपने ट्वीट में कहा कि भारत की विविधता को देखते हुए यहां केवल सहनशीलता और आपसी सम्मान के साथ ही एकता और प्रगति संभव है। उन्होंने वहाबी या सलाफी विचारधारा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी विचारधाराएं धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा देती हैं और भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में इनके लिए जगह नहीं होनी चाहिए।
पूर्व जज ने कहा कि महान सूफी संतों ने सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि सभी इंसानों के लिए प्रेम, दया, भाईचारे और सहनशीलता का संदेश दिया। उन्होंने महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की सीख का भी जिक्र किया और लिखा, “हर क़ौम रास्त रा, राहे दीन-ओ-क़िबला गाहे।”












