असदुद्दीन ओवैसी ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए संघ की विचारधारा और उसके प्रमुख विचारकों के पुराने बयानों का हवाला दिया है। ओवैसी ने सोशल मीडिया पोस्ट में भागवत के बयान, “अगर कोई हिंदू सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा”, को लेकर आरएसएस पर निशाना साधा।
ओवैसी ने कहा कि यह आरएसएस की “पुरानी रणनीति” है, जिसमें कुछ बातें दुनिया के सामने कही जाती हैं, जबकि संगठन के सदस्यों के लिए अलग विचार रखे जाते हैं। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस ने अपने प्रमुख विचारकों और लेखकों के विचारों से कभी स्पष्ट रूप से दूरी नहीं बनाई।
ओवैसी ने अपने पोस्ट में आरएसएस के संस्थापक के.बी. हेडगेवार, एम.एस. गोलवलकर और विनायक दामोदर सावरकर का उल्लेख करते हुए कई आरोप लगाए। उन्होंने हेडगेवार की एक जीवनी का हवाला देते हुए कहा कि वे हिंदू-मुस्लिम एकता के विचार से सहमत नहीं थे। वहीं, गोलवलकर के कथित विचारों का हवाला देते हुए ओवैसी ने आरोप लगाया कि आरएसएस लोकतंत्र के बजाय एक नेता, एक विचारधारा और एक ध्वज पर आधारित व्यवस्था का समर्थन करता रहा है।
ओवैसी ने गोलवलकर की पुस्तक Bunch of Thoughts का जिक्र करते हुए दावा किया कि इसमें मुसलमानों और ईसाइयों को ‘आंतरिक खतरा’ बताया गया है और मुसलमानों के प्रति हमेशा संदेह रखने की बात कही गई है। उन्होंने गुजरात दंगों का भी जिक्र करते हुए आरएसएस पर सवाल उठाए।
इसके अलावा ओवैसी ने समान नागरिक संहिता (UCC), धर्मांतरण विरोधी कानूनों और UAPA जैसे कानूनों को लेकर भी आरएसएस की विचारधारा पर निशाना साधा।
अपने पोस्ट के अंत में ओवैसी ने मोहन भागवत से अपील करते हुए कहा कि उन्हें सावरकर, हेडगेवार और गोलवलकर की “विवादित/जहरीली” रचनाओं के चुनिंदा अंश भी सार्वजनिक रूप से पढ़ने चाहिए, ताकि लोग खुद तय कर सकें कि वे आरएसएस के बारे में क्या सोचते हैं।












