नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के राजस्थान बस ब्लास्ट मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए अब्दुल हमीद की दोषसिद्धि और मौत की सजा रद्द कर दी। गिरफ्तारी के लगभग 30 साल और मौत की सजा सुनाए जाने के 12 साल बाद अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई में गंभीर प्रक्रियागत खामियां थीं और आरोपी को प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिली। कोर्ट ने एक साल के भीतर नए सिरे से ट्रायल पूरा करने का निर्देश दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि यह फैसला अभियोजन के सबूतों के गुण-दोष पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन के आधार पर दिया गया है। अदालत ने राजस्थान हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मामले को जयपुर की एक विशेष अदालत को सौंपने और एक वर्ष के भीतर ट्रायल पूरा कराने को कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गवाहों की गवाही के दौरान अब्दुल हमीद को प्रभावी कानूनी सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई, जिससे पूरी सुनवाई प्रभावित हुई। अदालत ने निर्देश दिया कि नए ट्रायल में उन्हें सक्षम और प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व दिया जाए।
पीठ ने सह-आरोपी पप्पू उर्फ सलीम को भी बरी कर दिया, जो विस्फोटकों की आपूर्ति के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहा था। साथ ही, राजस्थान सरकार की उस अपील को भी खारिज कर दिया जिसमें हाई कोर्ट द्वारा छह अन्य आरोपियों को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी। इनमें जम्मू-कश्मीर के जावेद खान, लतीफ अहमद, मोहम्मद अली भट्ट, मिर्जा निसा हुसैन, अब्दुल गनी और उत्तर प्रदेश के रईस बेग शामिल हैं।
गौरतलब है कि 22 मई 1996 को जयपुर-आगरा हाईवे पर एक बस में हुए विस्फोट में 14 लोगों की मौत हुई थी और 37 लोग घायल हुए थे। यह धमाका दिल्ली के लाजपत नगर बम विस्फोट के एक दिन बाद हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश के बाद फिलहाल इस मामले में कोई भी आरोपी दोषसिद्ध नहीं है। अब्दुल हमीद पर दोबारा मुकदमा चलेगा, जबकि बाकी सभी आरोपी बरी हो चुके हैं।












