रिपोर्ट में मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को मनमाना और पारदर्शिता से रहित बताया गया; उत्तर प्रदेश की दो विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ करीब 90 फीसदी आपत्ति फॉर्म दाखिल किए जाने का भी उल्लेख
नई दिल्ली: भारत में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर Human Rights Watch (HRW) ने गंभीर सवाल उठाए हैं। 28 अक्टूबर 2026 को जारी अपनी रिपोर्ट ‘India: Mass Voter Roll Exclusions Deeply Flawed’ में संगठन ने दावा किया है कि देशभर की मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रक्रिया में महिलाएं, गरीब, धार्मिक अल्पसंख्यक, विशेषकर मुस्लिम समुदाय और अन्य वंचित समूह असमान रूप से प्रभावित हुए हैं।
Human Rights Watch ने SIR की प्रक्रिया को मनमाना और अपारदर्शी बताते हुए आरोप लगाया है कि निर्वाचन आयोग ने नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव किए, जबकि मतदाताओं के नाम हटाने के लिए इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता पर भी सवाल हैं। संगठन ने यह भी कहा है कि मतदाता सूची से नाम हटने का असर केवल मतदान के अधिकार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कुछ मामलों में लोगों को सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्तियों और अन्य सेवाओं से भी वंचित होना पड़ा है।
रिपोर्ट तैयार करने के लिए HRW ने अगस्त 2026 से दिल्ली, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक में 70 लोगों से बातचीत की। इनमें SIR से प्रभावित परिवारों के 40 सदस्य, पूर्व चुनाव आयुक्त, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और एक मौजूदा चुनाव अधिकारी शामिल थे।
13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का दावा
रिपोर्ट के अनुसार, SIR के तहत मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं। बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले शुरू हुई प्रक्रिया के दौरान लगभग 47 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए। इसके बाद दूसरे चरण में 10 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों में ‘मैपिंग’ की प्रक्रिया शुरू की गई। इसमें मतदाताओं को खुद या अपने माता-पिता का नाम 2002 से 2006 के बीच तैयार की गई पुरानी मतदाता सूचियों में तलाशना था।
HRW का कहना है कि इस प्रक्रिया में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ (Logical Discrepancy) नाम से एक श्रेणी बनाई गई, लेकिन निर्वाचन आयोग ने इसे किसी लिखित सूचना में स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया। रिपोर्ट के मुताबिक, नामों की वर्तनी में अंतर, छह या उससे अधिक भाई-बहन होना और भाई-बहनों के जन्म के बीच नौ महीने से कम का अंतर होना भी संदेह का आधार बना।
पश्चिम बंगाल में बूथ लेवल अधिकारी के तौर पर काम कर रहे एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक ने HRW को बताया कि प्रशिक्षण के दौरान उन्हें ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई थी। उनके मुताबिक, SIR शुरू होने से पहले उन्हें केवल तीन दिन का प्रशिक्षण मिला और प्रक्रिया के दौरान नियम बदलते रहे।
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं पर असमान असर
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले की पाथरप्रतिमा विधानसभा सीट का विशेष उल्लेख किया गया है। HRW के अनुसार, इस निर्वाचन क्षेत्र में हटाए गए मतदाताओं में 92 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम थे, जबकि क्षेत्र की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी करीब 9 प्रतिशत है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पश्चिम बंगाल में जिन मतदाताओं की अपीलों पर फैसला हो चुका था, उनमें से करीब 93 प्रतिशत के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए गए। हालांकि, यह आंकड़ा केवल उन अपीलों से संबंधित है जिन पर फैसला हो चुका था। HRW ने कलकत्ता हाईकोर्ट के हवाले से बताया कि अभी भी 34 लाख से अधिक अपीलें लंबित हैं और इनके निपटारे में 21 साल तक लग सकते हैं।
संगठन ने इसे इस बात का संकेत बताया है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में ऐसे लोग प्रभावित हुए, जिनके नाम बाद में अपील के जरिए बहाल किए गए।
उत्तर प्रदेश में फॉर्म-7 के इस्तेमाल पर सवाल
HRW की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश का भी उल्लेख है। इसके मुताबिक, राज्य की दो विधानसभा सीटों पर मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए दाखिल किए गए फॉर्म-7 में करीब 90 प्रतिशत आवेदन मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ थे।
फॉर्म-7 के जरिए कोई भी व्यक्ति मतदाता सूची में दर्ज किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर आपत्ति दर्ज करा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, कई राज्यों में इस फॉर्म का इस्तेमाल बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल करने के लिए किया गया। विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने आरोप लगाया कि भाजपा के बूथ स्तर के एजेंटों ने मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटवाने के लिए इस प्रक्रिया का दुरुपयोग किया।
रिपोर्ट में उत्तराखंड का भी जिक्र है, जहां भाजपा से कथित तौर पर जुड़े पांच लोगों ने मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ नाम हटाने के लिए 6,500 आवेदन दाखिल किए थे। HRW के अनुसार, अक्टूबर 2025 में SIR शुरू होने के दौरान बूथ लेवल एजेंटों को प्रतिदिन 50 फॉर्म दाखिल करने की अनुमति थी, जबकि 2023 तक यह सीमा 10 फॉर्म प्रतिदिन थी। अक्टूबर 2026 में निर्वाचन आयोग ने दावा-आपत्ति की अवधि के दौरान प्रत्येक मतदाता के लिए कुल 10 फॉर्म दाखिल करने की सीमा तय की।
महिलाओं के नाम भी बड़ी संख्या में हटे
रिपोर्ट में महिलाओं पर SIR के प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई है। HRW ने द हिंदू के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि बिहार में मतदाता सूची से हटाए गए नामों में करीब 60 प्रतिशत महिलाएं थीं। पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत से अधिक था। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में लगभग 60 लाख महिलाएं विधानसभा चुनाव में मतदान नहीं कर सकीं।
HRW का कहना है कि शादी के बाद उपनाम और पता बदलने, दस्तावेजों में वर्तनी के अंतर और माता-पिता की पुरानी मतदाता सूची से नाम का मिलान नहीं हो पाने जैसी वजहों से महिलाओं को अधिक परेशानी हुई। कई मामलों में शादी के बाद पति के घर चले जाने वाली महिलाओं को ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ (Permanently Shifted) मानकर सूची से बाहर कर दिया गया।
रिपोर्ट में विधवाओं, अकेली महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाओं को विशेष रूप से प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
दिल्ली में घरों के ध्वस्तीकरण के बाद मतदाता सूची से नाम हटे
HRW ने दिल्ली के उन नौ मतदान केंद्रों का भी उल्लेख किया है, जहां घरों को ध्वस्त किए जाने के बाद करीब 87 प्रतिशत मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, बूथ लेवल अधिकारियों ने विस्थापित मतदाताओं को ‘अनुपस्थित/पता नहीं चल पाया’ (Absent/Untraceable) की श्रेणी में दर्ज किया।
संगठन का कहना है कि घरों से बेदखल किए गए कई लोगों को यह स्पष्ट नहीं था कि मतदाता फॉर्म में वे अपना कौन-सा पता दर्ज करें। अक्टूबर में दिल्ली के चुनाव अधिकारियों ने घरों के ध्वस्तीकरण से प्रभावित मतदाताओं के नाम दोबारा दर्ज करने के लिए विशेष शिविर लगाने की बात कही थी।
सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता पर भी सवाल
रिपोर्ट में SIR के दौरान इस्तेमाल किए गए सॉफ्टवेयर को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। HRW के अनुसार, इस सॉफ्टवेयर तक निर्वाचन आयोग के बाहर किसी की पहुंच नहीं है। 2002 से 2006 के बीच की पुरानी मतदाता सूचियों को स्कैन करके डिजिटाइज किया गया और अलग-अलग भारतीय भाषाओं में दर्ज नामों को अंग्रेजी में बदला गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस प्रक्रिया में नामों की वर्तनी की सटीकता सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कोई स्पष्ट मानक नहीं था।
दिसंबर 2025 में पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने भी स्वीकार किया था कि 2002 के आंकड़ों को सही तरीके से डिजिटाइज नहीं किए जाने के कारण सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी आ रही थी।
HRW के मुताबिक, ‘मोहम्मद’, ‘मोहम्मद’, ‘मोहद’ और ‘एमडी’ जैसे नामों के अलग-अलग रूपों तथा ‘शेख’, ‘शेख’ और ‘एसके’ जैसी वर्तनियों के कारण मुस्लिम और आदिवासी समुदायों के लोगों के नाम अधिक संख्या में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के तहत चिह्नित हुए।
मतदाता सूची से नाम कटने का असर सरकारी योजनाओं पर भी
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मतदाता सूची से नाम हटने के बाद कुछ लोगों को राशन, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, छात्रवृत्ति और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए जरूरी निवास प्रमाणपत्र हासिल करने में भी परेशानी हुई।
HRW के अनुसार, बिहार में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सब्सिडी वाले राशन के लाभार्थियों के नामों में तीन प्रतिशत से अधिक की कटौती की गई। पश्चिम बंगाल में कुछ ऐसे लोगों को भी महिलाओं के लिए चलाई जा रही अन्नपूर्णा योजना के तहत नकद सहायता मिलना बंद हो गया, जिन्होंने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील दायर की थी।
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल के एक दर्जी का मामला भी दर्ज है, जिसके 14 वर्षीय बेटे को अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति नहीं मिल सकी। स्कूल प्रशासन ने छात्रवृत्ति के लिए माता-पिता का मतदाता सूची में शामिल होना जरूरी बताया था। एक अन्य मामले में एक व्यक्ति को सरकारी विश्वविद्यालय में पीएचडी कार्यक्रम में प्रवेश मिलने के बावजूद निवास प्रमाणपत्र नहीं मिल पाया।
HRW ने SIR प्रक्रिया रद्द करने की मांग की
Human Rights Watch ने भारत सरकार से SIR की उस प्रक्रिया को तत्काल रद्द करने की मांग की है, जिसके कारण उसके अनुसार लाखों पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हुए हैं। संगठन ने गलत तरीके से हटाए गए सभी पात्र मतदाताओं के नाम तत्काल बहाल करने, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर कार्रवाई रोकने और कथित राजनीतिक हस्तक्षेप की स्वतंत्र जांच कराने की अपील की है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत अंतरराष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र की संधि (ICCPR) का पक्षकार है, जो नागरिकों को चुनाव में भाग लेने और बिना भेदभाव सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच का अधिकार देती है।
हालांकि, निर्वाचन आयोग ने अक्टूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में अपने कामकाज का बचाव किया था और अनियमितताओं के आरोपों को खारिज किया था। ऐसे में SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची से नाम हटाने के आधार और प्रभावित लोगों की अपीलों के निपटारे को लेकर विवाद जारी है।












