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मुस्लिम बहुल, SC आरक्षित और प्रवासी आबादी वाले इलाकों में नाम छूटने की दर सबसे ज्यादा: रिपोर्ट

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SPECT Research Association ने दिल्ली में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) प्रक्रिया पर एक प्रारंभिक रिपोर्ट जारी की है, जिसका शीर्षक “Who Gets Left Out? Exclusion and Vulnerability in Delhi’s SIR Draft Electoral Roll” है। रिपोर्ट में मुख्य रूप से तुगलकाबाद और ओखला विधानसभा क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया है। इन दोनों क्षेत्रों में ड्राफ्ट मतदाता सूची से बाहर रह गए लोगों की दर सबसे अधिक दर्ज की गई है। इसके अलावा, दिल्ली के उन अन्य विधानसभा क्षेत्रों के कुछ मतदान केंद्रों (पोलिंग पार्ट्स) का भी रैंडम सैंपल लिया गया है, जहां नाम छूटने की दर अधिक रही है, ताकि दिल्ली में इस प्रक्रिया के व्यापक पैटर्न और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच अंतर को समझा जा सके।

दिल्ली में SIR से पहले लगभग 1.45 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे, जबकि SIR की ड्राफ्ट मतदाता सूची में 97.53 लाख मतदाता ही दर्ज हैं। इसका मतलब है कि पहले की मतदाता सूची में शामिल लगभग 47.6 लाख नाम, यानी कुल मतदाताओं के करीब 32.8 प्रतिशत, ड्राफ्ट सूची में दिखाई नहीं दे रहे हैं। हालांकि, इन नामों को अभी अंतिम रूप से हटाया गया नाम नहीं माना जा सकता, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नामों का ड्राफ्ट सूची से गायब होना और अलग-अलग इलाकों में इसका असमान प्रभाव पड़ना मतदाता सूची तैयार करने और सत्यापन की प्रक्रिया की समावेशिता और विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े करता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में नामों के छूटने की दर सभी क्षेत्रों में एक जैसी नहीं है। 13 विधानसभा क्षेत्रों में यह दर 40 प्रतिशत या उससे अधिक है। इनमें तुगलकाबाद में सबसे अधिक 47.8 प्रतिशत, उसके बाद ओखला में 45.2 प्रतिशत, आर.के. पुरम में 44.4 प्रतिशत, कस्तूरबा नगर में 43.9 प्रतिशत, कालकाजी में 42.7 प्रतिशत और बदरपुर में 42.5 प्रतिशत नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं। इसके अलावा नई दिल्ली, जंगपुरा, महरौली, पटेल नगर, संगम विहार, करोल बाग और पटपड़गंज में भी नाम छूटने की दर 40 प्रतिशत या उससे अधिक है।

इसके मुकाबले रोहिणी में यह दर लगभग 16.5 प्रतिशत और शकूर बस्ती में 18.7 प्रतिशत है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे अधिक नाम छूटने वाले विधानसभा क्षेत्रों में अलग-अलग तरह के इलाके शामिल हैं। इनमें मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र, अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित क्षेत्र, पुनर्वास कॉलोनियां और बड़ी संख्या में प्रवासी आबादी वाले घनी आबादी के कामकाजी वर्ग के इलाके शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, विधानसभा क्षेत्र के औसत आंकड़े कई बार वास्तविक स्थिति को पूरी तरह सामने नहीं ला पाते, क्योंकि एक ही विधानसभा क्षेत्र के अलग-अलग पोलिंग पार्ट्स में नाम छूटने की दर में बहुत बड़ा अंतर हो सकता है।

तुगलकाबाद में कई पोलिंग पार्ट्स में आधे से अधिक नाम गायब

तुगलकाबाद में रिपोर्ट ने 2025 में 10,187 मतदाताओं वाले नौ पोलिंग पार्ट्स की जांच की। इनमें से SIR की ड्राफ्ट सूची में केवल 3,756 मतदाता दिखाई दिए। यानी 6,431 मतदाता, या कुल मतदाताओं के 63.1 प्रतिशत, ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं।

इन नौ में से आठ पोलिंग पार्ट्स में आधे से अधिक मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं मिले। छह में यह कमी 60 प्रतिशत से अधिक, तीन में 70 प्रतिशत से अधिक और एक पोलिंग पार्ट में 80 प्रतिशत से अधिक रही।

रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा कमी संवेदनशील बस्तियों वाले इलाकों में दिखाई देती है। जनता जीवन कैंप और उससे सटे ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेज-II को कवर करने वाले दो पोलिंग पार्ट्स में क्रमशः 72.6 प्रतिशत और 72.4 प्रतिशत नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं मिले। इन दोनों पोलिंग पार्ट्स में पहले पंजीकृत 2,796 मतदाताओं में से 2,027 अब ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं। यानी यहां लगभग 72.5 प्रतिशत मतदाताओं की कमी दर्ज की गई।

पुल पहलादपुर के तीन सैंपल किए गए पोलिंग पार्ट्स में भी कुल मिलाकर नाम छूटने की दर 60.7 प्रतिशत रही।

वहीं, आसपास के पोलिंग पार्ट्स में भी काफी अलग-अलग आंकड़े सामने आए। उदाहरण के लिए, हरकेश नगर में एक पोलिंग पार्ट में नाम छूटने की दर 29.3 प्रतिशत, जबकि दूसरे में 64 प्रतिशत रही। रिपोर्ट के मुताबिक, इससे पता चलता है कि केवल विधानसभा क्षेत्र के औसत आंकड़े देखने से उन इलाकों का पता नहीं चल सकता जहां नाम छूटने की समस्या बहुत अधिक केंद्रित है।

ओखला में 11 पोलिंग पार्ट्स के 55.25% नाम ड्राफ्ट में नहीं

ओखला विधानसभा क्षेत्र में पूरे क्षेत्र के स्तर पर नाम छूटने की दर 45.2 प्रतिशत है। हालांकि, रिपोर्ट में जांचे गए 11 पोलिंग पार्ट्स में स्थिति इससे भी अधिक गंभीर दिखाई देती है। इन हिस्सों में कुल 14,403 मतदाताओं में से 7,958, यानी 55.25 प्रतिशत, मतदाता ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं।

तैमूर नगर में स्थिति विशेष रूप से गंभीर पाई गई। यहां जांचे गए दो पोलिंग पार्ट्स में नाम छूटने की संयुक्त दर 75.78 प्रतिशत रही। खिजराबाद गांव में यह दर 74.82 प्रतिशत दर्ज की गई।

वहीं, बटला हाउस के दो पोलिंग पार्ट्स में कुल 58.72 प्रतिशत नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं मिले। इसके अलावा जाकिर नगर, हाजी कॉलोनी और जोगाबाई में भी मतदाताओं की संख्या में बड़ी कमी दिखाई दी।

इन 11 सैंपल किए गए पोलिंग पार्ट्स में नाम छूटने की दर 26.57 प्रतिशत से लेकर 76.99 प्रतिशत तक रही।

दूसरे इलाकों में भी बड़ा अंतर

दिल्ली के दूसरे विधानसभा क्षेत्रों से लिए गए रैंडम सैंपल में भी इसी तरह का अंतर दिखाई देता है। बुराड़ी में जिन पोलिंग पार्ट्स का सैंपल लिया गया, वहां नाम छूटने की दर 17.7 प्रतिशत से 55.6 प्रतिशत के बीच रही। वहीं शालीमार बाग में यह दर 22.8 प्रतिशत से 66.1 प्रतिशत के बीच रही।

नई दिल्ली, मटिया महल और कालकाजी के कुछ पोलिंग पार्ट्स में भी ड्राफ्ट मतदाता सूची से नाम छूटने की दर 50 प्रतिशत के करीब या उससे अधिक दर्ज की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, इन आंकड़ों से पता चलता है कि दिल्ली की SIR प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता केवल बड़ी संख्या में नामों का ड्राफ्ट सूची में नहीं होना नहीं है, बल्कि यह भी है कि अलग-अलग इलाकों में इसका प्रभाव बेहद असमान है।

किन लोगों पर अधिक असर पड़ सकता है?

रिपोर्ट में कुछ ऐसे समूहों की पहचान की गई है, जिन्हें मतदाता सूची में नाम छूटने का अधिक जोखिम हो सकता है। इनमें प्रवासी मजदूर, किरायेदार, गरीब और कामकाजी वर्ग के परिवार, अनौपचारिक और अनधिकृत बस्तियों में रहने वाले लोग, बुजुर्ग, हाल में अपना निवास बदलने वाली महिलाएं, छात्र और युवा, बेघर लोग तथा सीमित डिजिटल या प्रशासनिक जानकारी रखने वाले लोग शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, इन लोगों को पते के आधार पर सत्यापन, जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने और ड्राफ्ट सूची में नाम छूटने के बाद उसे ठीक कराने की प्रशासनिक प्रक्रिया में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

इसलिए दिल्ली की SIR ड्राफ्ट मतदाता सूची को लेकर चिंता केवल इस बात की नहीं है कि पहले से पंजीकृत लाखों मतदाताओं के नाम इसमें दिखाई नहीं दे रहे हैं। चिंता यह भी है कि इन नामों को दोबारा शामिल कराने की जिम्मेदारी और प्रक्रिया का बोझ उन नागरिकों पर अधिक पड़ सकता है जो पहले से ही प्रशासनिक व्यवस्था तक पहुंच के मामले में कमजोर स्थिति में हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन पोलिंग पार्ट्स में नाम छूटने की दर असाधारण रूप से अधिक है, उनकी गहन जांच और स्वतंत्र सत्यापन की जरूरत है। इसके साथ ही, प्रभावित इलाकों में सक्रिय रूप से लोगों तक पहुंच बनाना और दावे एवं आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना जरूरी होगा।

रिपोर्ट के अनुसार, विशेष रूप से उन इलाकों में जहां नाम छूटने की दर बहुत अधिक है, विस्तृत जांच और लोगों की मदद के लिए सक्रिय प्रयास यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होंगे कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पहले से मौजूद सामाजिक असमानताओं को चुनावी भागीदारी तक पहुंच में और गहरा न करे।

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