लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने और छह महीने के लिए गोंडा जिले से जिला बदर करने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि एक अकेला लंबित आपराधिक मामला किसी व्यक्ति की ‘आदतन आपराधिक प्रवृत्ति’ साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने जाहिद अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में गोंडा के जिलाधिकारी के आदेश के साथ-साथ उसे बरकरार रखने वाले कमिश्नर के आदेश को भी रद्द कर दिया।
बरी किए गए मामले को बनाया आधार
जिलाधिकारी ने उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 की धारा 3(1) के तहत जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित किया था। पुलिस रिपोर्ट में 2010 और 2020 के दो आपराधिक मामलों तथा एक बीट सूचना रिपोर्ट का हवाला दिया गया था।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि 2010 के मामले में जाहिद अली को अगस्त 2017 में ही अदालत ने बरी कर दिया था। इसके बाद उनके खिलाफ केवल 2020 का एक मामला लंबित था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मामले में बरी किए जा चुके व्यक्ति के खिलाफ उसी मामले को ‘गुंडा’ घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
एक मुकदमा ‘आदतन अपराध’ साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं
अदालत ने कहा कि गुंडा एक्ट के तहत ‘आदतन’ अपराधी होने के लिए अपराधों में निरंतरता और बार-बार अपराध करने की प्रवृत्ति दिखाई देनी चाहिए। केवल एक मामले से यह साबित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 2020 में दर्ज मामले और 2026 में ‘गुंडा’ घोषित किए जाने के बीच लंबा अंतराल है और दोनों के बीच कोई उचित संबंध नहीं दिखता।
पुलिस की भूमिका पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि पुलिस को जाहिद अली के 2017 में बरी होने की जानकारी होनी चाहिए थी। इसके बावजूद उस मामले को पुलिस रिपोर्ट में शामिल किया गया। अदालत के अनुसार, यह “जिलाधिकारी के सामने याचिकाकर्ता की गलत तस्वीर पेश करने” के समान है।
कमिश्नर के आदेश पर भी कोर्ट ने कहा कि बरी किए जाने की जानकारी होने के बावजूद जाहिद अली को दो आपराधिक मामलों में शामिल बताया गया, जिससे पता चलता है कि उनकी दलीलों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया।
अदालत ने बीट सूचना रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ घोषित करने से पहले उसे उचित सुनवाई का अवसर दिया जाना जरूरी है।
‘गुंडा एक्ट का दुरुपयोग न हो’
हाईकोर्ट ने कहा कि गुंडा एक्ट का इस्तेमाल बेहद सावधानी और केवल स्पष्ट मामलों में किया जाना चाहिए। इसका इस्तेमाल किसी निर्दोष व्यक्ति के उत्पीड़न या बिना दोषसिद्धि के सजा देने के लिए नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि उसके सामने ऐसे कई मामले आ रहे हैं, जो यह संकेत देते हैं कि राज्य “गुंडा एक्ट को उत्पीड़न के हथियार के रूप में इस्तेमाल” कर रहा है। अदालत ने मौजूदा मामले को कानून के “दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण” बताया।
हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी के गुंडा घोषित करने और जिला बदर करने के आदेश के साथ-साथ कमिश्नर के अपीलीय आदेश को भी रद्द कर दिया।












