नई दिल्ली: एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) ने मंगलवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में “Jailed Without Trial: The Politics of Imprisonment” विषय पर एक सार्वजनिक चर्चा आयोजित की। इसमें वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानूनी समुदाय से जुड़े लोगों ने लंबे समय तक बिना मुकदमे के जेल में रखे जाने, कड़े आतंकवाद विरोधी कानूनों के इस्तेमाल, संवैधानिक अधिकारों और निष्पक्ष न्याय की प्रक्रिया जैसे मुद्दों पर चर्चा की।
चर्चा के केंद्र में छात्र कार्यकर्ता और शोधकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम रहे, जो करीब छह वर्षों से तिहाड़ जेल में बंद हैं और अभी तक उनके मामले में मुकदमा पूरा नहीं हुआ है। दोनों को 2020 की शुरुआत में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने उन पर फरवरी 2020 में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की साजिश में प्रमुख भूमिका निभाने का आरोप लगाया है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने लंबे समय तक विचाराधीन कैद को व्यक्ति की स्वतंत्रता, निर्दोष माने जाने की धारणा, न्याय तक पहुंच और निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकार के संदर्भ में देखा। साथ ही जमानत की कार्यवाही और कड़े कानूनों के आरोपी व्यक्तियों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव पर भी चर्चा हुई।
पैनल में अधिवक्ता सलमान खुर्शीद, संजय हेगड़े, शाहरुख आलम, प्रशांत भूषण, निजाम पाशा और वारिशा फरासत शामिल थे, जबकि कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता अहमद इब्राहिम ने किया।
वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद (Salman Khaurshid) ने कहा कि समाज इस कदर पीड़ा का आदी हो गया है कि अब लोग उसकी शिकायत या आवाज उठाना भी छोड़ चुके हैं। उन्होंने कहा कि सवाल केवल उमर खालिद (Umar Khalid) और शरजील इमाम (Sharjeel Imam) का नहीं, बल्कि यह भी है कि व्यवस्था और उसका ढांचा किस दिशा में जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है और संविधान नागरिकों को अपनी शिकायत रखने का अधिकार देता है।
अधिवक्ता संजय हेगड़े (Sanjay Hegde) ने अदालतों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि अगर अदालतें कानून के शासन की रक्षा करने में विफल रहती हैं तो स्थिति गंभीर हो जाती है। उन्होंने उमर और शरजील सहित अन्य आरोपियों को व्यवस्था का पीड़ित बताते हुए न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
अधिवक्ता शाहरुख आलम ने कहा कि पुलिस की भूमिका जांच से शुरू होकर गिरफ्तारी और सबूत अदालत के सामने रखने तक होती है, जिसके बाद अदालत आरोपी के दोषी या निर्दोष होने का फैसला करती है। उन्होंने लंबे समय तक मुकदमे में देरी और जमानत के सवाल पर भी चिंता जताई।
अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) ने उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में मुकदमे में हो रही देरी पर सवाल उठाते हुए कहा कि छह साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद ट्रायल शुरू नहीं हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि मामले में अभियोजन की कार्रवाई कथित दुर्भावना के आधार पर ही समाप्त की जानी चाहिए थी।
वहीं, अधिवक्ता निजाम पाशा ने बलवंत सिंह मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने केवल नारेबाजी को आतंकवादी गतिविधि नहीं माना था। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति की कीमत कुछ नागरिकों को अपनी वर्षों की स्वतंत्रता गंवाकर नहीं चुकानी चाहिए।
APCR ने कहा कि दोष सिद्ध होने से पहले लंबे समय तक जेल में रहना ऐसे परिणाम पैदा करता है, जिनकी भरपाई बाद में बरी होने की स्थिति में भी आसानी से नहीं की जा सकती। संगठन ने कहा कि जिन मामलों में आरोपी वर्षों से जेल में हैं और मुकदमा अभी तक निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंचा है, वहां समय पर सुनवाई और संवैधानिक सुरक्षा उपायों पर लगातार सार्वजनिक और कानूनी चर्चा जरूरी है।












