जमीअत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख अरशद मदनी (Arshad Madani) ने प्रस्तावित वंदे मातरम् बिल का विरोध करते हुए इसे संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी के “वंदे मातरम्” पढ़ने या गाने से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी आस्था के अनुसार किसी दूसरे को इबादत में साझी नहीं ठहरा सकता। उनका कहना था कि “वंदे मातरम्” के कुछ हिस्से इस्लामी मान्यताओं के अनुरूप नहीं हैं, इसलिए किसी भी मुसलमान को इसे गाने या स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
मदनी ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता और अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। उन्होंने कहा कि किसी भी नागरिक को उसके धार्मिक विश्वास के विरुद्ध किसी गीत, नारे या विचार को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि देश इस समय बेरोज़गारी, महंगाई, आर्थिक चुनौतियों, किसानों की समस्याओं और युवाओं के भविष्य जैसे गंभीर मुद्दों का सामना कर रहा है। ऐसे में विवादास्पद विषयों को प्राथमिकता देने के बजाय संसद को जनता से जुड़े वास्तविक और महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।











