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सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद गिराए जाने पर, ओवैसी-मायावती-चंद्रशेखर और कांग्रेस नेताओं ने सरकार को घेरा।

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सहारनपुर: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में कलेक्ट्रेट परिसर स्थित पुरानी मस्जिद को प्रशासन द्वारा शुक्रवार सुबह करीब 5 बजे ध्वस्त किए जाने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई को लेकर समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और आज़ाद समाज पार्टी के नेताओं ने प्रशासन और उत्तर प्रदेश सरकार पर सवाल उठाए हैं। नेताओं ने कार्रवाई की जल्दबाजी, मस्जिद से जुड़े पुराने दस्तावेजों और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं।

मामले को लेकर इलाके में तनाव की स्थिति बनी हुई है और पुलिस-प्रशासन की भारी मौजूदगी के बीच राजनीतिक गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। सपा सांसद इकरा हसन के मस्जिद स्थल पर जाने की कोशिश के दौरान उन्हें हाउस अरेस्ट किए जाने की बात भी सामने आई है। वहीं, कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और इमरान प्रतापगढ़ी समेत कई विपक्षी नेताओं ने प्रशासन की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए हैं।

क्या है मस्जिद विवाद?

प्रशासन का कहना है कि कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को सिटी मजिस्ट्रेट ने पिछले महीने अवैध मानते हुए ध्वस्तीकरण और बेदखली का आदेश दिया था। इस आदेश को मुस्लिम पक्ष ने जिला एवं सत्र न्यायालय में चुनौती दी थी।

मस्जिद पक्ष की ओर से अदालत में पुराने राजस्व अभिलेख, वक्फ पंजीकरण और मस्जिद के 1947 से पहले अस्तित्व में होने से जुड़े दस्तावेज पेश किए जाने का दावा किया गया। पक्ष की ओर से 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल, नगर पालिका परिषद में दर्ज नाम और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज भी अदालत के समक्ष रखे जाने की बात कही गई है।

मस्जिद पक्ष का दावा है कि संबंधित संपत्ति सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है और जमीन वक्फ संपत्ति का हिस्सा है। खेवट नंबर 10/1 का हवाला देते हुए यह भी दावा किया गया है कि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन वाहिद खान और याकूब खान के नाम दर्ज है।

प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर जिला जज की अदालत ने 3 सितंबर को सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद प्रशासन ने शुक्रवार को मस्जिद को सील किया और शनिवार सुबह करीब 5 बजे उसे ध्वस्त कर दिया।

ओवैसी ने उठाए धार्मिक स्वतंत्रता पर सवाल

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या मुसलमानों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार भी अब सुरक्षित नहीं रह गया है।

ओवैसी ने कहा कि मस्जिद कमेटी ने अदालत में 1911 के दस्तावेज पेश करके यह बताने की कोशिश की थी कि मस्जिद कलेक्ट्रेट से पहले से मौजूद थी। उनके मुताबिक, एक सदी से अधिक समय से वहां लगातार नमाज़ होती रही है।

उन्होंने इसे ‘वक्फ बाय यूज़र’ और लंबे समय से चले आ रहे कब्जे से जुड़े कानूनी सवालों से जोड़ते हुए कहा कि सरकार किसी जमीन पर दशकों या एक सदी से अधिक समय से खुले और लगातार चले आ रहे कब्जे को अचानक नजरअंदाज नहीं कर सकती।

ओवैसी ने कहा कि मस्जिद को लेकर किसी को परेशानी हो सकती है, लेकिन किसी की नाराज़गी के आधार पर इबादतगाह पर बुलडोजर नहीं चलाया जा सकता। उन्होंने कहा, “मेरी मज़हबी आज़ादी आपकी रहम-ओ-करम पर मुबनी नहीं है।”

मायावती ने भी कार्रवाई रोकने की मांग की

BSP प्रमुख मायावती ने भी सहारनपुर की मस्जिद सहित उत्तर प्रदेश में मस्जिदों को कथित तौर पर अवैध बताकर ध्वस्त किए जाने की कार्रवाई पर आपत्ति जताई।

मायावती ने कहा कि मस्जिदों को “काफी आपाधापी में अवैध बताकर” ध्वस्त करने का सरकारी अभियान ठीक नहीं है। उन्होंने सरकार से ऐसे अभियानों पर तत्काल रोक लगाने और विवादों के समाधान के लिए दूसरे उपाय अपनाने की मांग की।

उन्होंने कहा कि एक संवैधानिक सेक्युलर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी धर्मों के मानने वालों और उनके धार्मिक स्थलों का समान रूप से सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करे।

मायावती ने कथित बुलडोजर कार्रवाई के व्यापक मुद्दे पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि बिना नियम-कानून का समुचित पालन किए किसी अभियुक्त के मकान को ध्वस्त करना और उसके पूरे परिवार को बेघर कर देना लोगों को विचलित कर रहा है।

BSP प्रमुख ने सरकार और न्यायपालिका दोनों से ऐसे मामलों पर गंभीरता से ध्यान देने की अपील की। साथ ही उन्होंने सभी पक्षों से सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाए रखने की अपील भी की।

चंद्रशेखर आज़ाद ने बताया जल्दबाजी में लिया गया कदम

आज़ाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने मस्जिद को ध्वस्त किए जाने को जल्दबाजी में लिया गया कदम बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मस्जिद पक्ष के पास उच्च न्यायालय में जिला अदालत के फैसले को चुनौती देने का विकल्प मौजूद था, तो प्रशासन ने इतनी जल्दी कार्रवाई क्यों की।

आजाद ने कहा कि जिला जज की अदालत द्वारा 3 सितंबर को सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखने के बाद 4 सितंबर को मस्जिद को सील कर दिया गया और अगले दिन सुबह करीब 5 बजे उसे ध्वस्त कर दिया गया।

उन्होंने दावा किया कि मस्जिद पक्ष ने अदालत के सामने पुराने राजस्व अभिलेखों, वक्फ पंजीकरण, 1947 से पहले के अस्तित्व और पूजा स्थल अधिनियम, 1991 से जुड़े प्रावधानों सहित कई ऐतिहासिक दस्तावेज पेश किए थे।

आजाद ने यह भी सवाल उठाया कि जब मस्जिद पक्ष जिला अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की बात कह रहा था, तो न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण तक इंतजार क्यों नहीं किया गया।

उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई को भाजपा सरकार की कथित साम्प्रदायिक राजनीति और तुष्टीकरण से जोड़ते हुए कहा, “यह अन्याय याद रखा जाएगा।”

इमरान मसूद ने संविधान और कानून का हवाला दिया

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी मस्जिद गिराए जाने की कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने इसे संविधान और कानून के खिलाफ बताया और कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता पूरी रात अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते रहे, लेकिन तमाम जानकारी देने के बावजूद मस्जिद को गिरा दिया गया।

मसूद ने कहा कि मस्जिद काफी पुरानी है और इसके मालिकाना हक से संबंधित दस्तावेज भी मौजूद हैं। उन्होंने दावा किया कि मस्जिद 1911 से पहले की है और जमीन की मिल्कियत से जुड़े रिकॉर्ड वाहिद खान और याकूब खान के नाम हैं।

उन्होंने यह भी दावा किया कि सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश में 30 दिन का समय दिया गया था और इस मामले में अदालत से स्टे भी मिला था। मसूद ने कहा कि इसके बावजूद कार्रवाई कर दी गई।

कांग्रेस सांसद ने वक्फ और ‘वक्फ बाय यूज़र’ से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि मामले में वक्फ बोर्ड को पक्षकार नहीं बनाया गया और लिमिटेशन एक्ट से जुड़े पहलुओं पर भी पर्याप्त विचार नहीं किया गया।

मसूद ने मस्जिद की जमीन के टाइटल को लेकर भी प्रशासन की दलीलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल खसरे में दर्ज स्थिति से जमीन के अंतिम मालिकाना हक का निर्धारण नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि वह इस मामले को कानून के दायरे में रहते हुए हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे।

इमरान प्रतापगढ़ी बोले- “हर चीज को अवैध बताया जा रहा है”

कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने भी मस्जिद गिराए जाने पर सरकार को घेरा। उन्होंने सवाल किया कि अगर करीब 100 साल पुरानी मस्जिद भी सरकार को अवैध नजर आती है तो फिर देश में वैध क्या है।

प्रतापगढ़ी ने आरोप लगाया कि कलेक्ट्रेट बनने से पहले अंग्रेजों के समय से मौजूद मस्जिद को भी अवैध बताया जा रहा है। उन्होंने सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि अपने ही देश के नागरिकों और उनके धार्मिक स्थलों को इस तरह गिराया जाएगा तो लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े होंगे।

उन्होंने इस कार्रवाई को चुनावी राजनीति से भी जोड़ते हुए आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सरकार छात्रों और अन्य मुद्दों से जुड़े सवालों से घिरी हुई है और ऐसे मामलों के जरिए राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

चुनाव से पहले गरमाया सियासी माहौल

सहारनपुर मस्जिद प्रकरण ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। मस्जिद के ध्वस्तीकरण ने विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का एक नया मुद्दा दे दिया है।

एक ओर प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई न्यायिक आदेश और सिटी मजिस्ट्रेट के ध्वस्तीकरण आदेश के आधार पर की गई, वहीं दूसरी ओर विपक्षी नेताओं और मस्जिद पक्ष का दावा है कि पुराने दस्तावेजों, वक्फ की स्थिति और संपत्ति से जुड़े कानूनी पहलुओं पर पर्याप्त विचार किए बिना कार्रवाई की गई।

अब मस्जिद पक्ष की ओर से उच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने की बात कही जा रही है। ऐसे में इस पूरे मामले में आगे होने वाली न्यायिक कार्रवाई पर नजर रहेगी। फिलहाल, मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद सहारनपुर में राजनीतिक बयानबाजी तेज है और विपक्ष इस मुद्दे को धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और कानून के शासन से जोड़कर सरकार को घेर रहा है।

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