नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के लिए निर्धारित 24 घंटे की अवधि उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से नहीं, बल्कि उस समय से शुरू होगी जब उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर वास्तव में रोक लगा दी जाती है। अदालत के मुताबिक पुलिस हिरासत और गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम अंतर करके संवैधानिक सुरक्षा को टाला नहीं जा सकता।
इंडियन एक्सप्रेस की 6 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे की समय-सीमा व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित किए जाने के क्षण से लागू होती है। इस अवधि में मजिस्ट्रेट तक पहुंचने में लगने वाला यात्रा समय अलग रखा जाता है।
मामला मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में पकड़े गए लोगों से जुड़ा था। जांच एजेंसी ने उन्हें पहले रोका और तलाशी तथा पूछताछ की, लेकिन औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन दर्ज की। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को पहले से अपने नियंत्रण में रखने के बाद गिरफ्तारी का समय बाद में दर्ज करना 24 घंटे की संवैधानिक सीमा को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।
पीठ ने मजिस्ट्रेटों को निर्देश दिया कि वे यह दर्ज करें कि व्यक्ति की स्वतंत्रता पहली बार किस समय सीमित की गई थी। यदि उसे 24 घंटे के भीतर पेश नहीं किया जाता, तो उसे रिहा किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि 24 घंटे के भीतर पेश किए जाने के बावजूद हिरासत की अवधि और उसके आधार की उचितता की जांच की जा सकती है।
यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि अनुच्छेद 22(2) मनमानी हिरासत के खिलाफ संवैधानिक सुरक्षा देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाशी, जब्ती या पूछताछ के नाम पर व्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगी रोक के समय को इस सुरक्षा से बाहर नहीं रखा जा सकता।











